आपदा क्या है? आपदा प्रबंधन की आवश्यकता क्यों है?

आपदा एक ऐसी प्राकृतिक अथवा मानव जनित घटना है, जिसके कारण समाज का सामान्य जीवन अचानक बाधित हो जाता है तथा जान-माल की अत्यधिक क्षति होती है l आपदाओं में लोगों की जान चली जाती है और लोग तबाह हो जाते हैं l यह हमारे जीवन, आजीविका, घर-मकान, सामाजिक व्यवस्था तथा सबसे बढ़कर विकास को बुरी तरह प्रभावित करती है l

आपदा क्या है? आपदा प्रबंधन की आवश्यकता क्यों है?

वर्तमन परिप्रेक्ष्य में, हम सभी को आपदा एवं आपदा प्रबंधन के बारे में ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है l इसलिए आप इस लेख को पूरा जरुर पढ़ लें ताकि आप बिभिन्न प्रकार के आपदाओं को समझ सकें तथा नाजुकता को समझते हुए अपनी क्षमता विकसित कर जोखिम एवं खतरा को कम कर सकें l

अब जब हमने आपदा के सन्दर्भ में जोखिम, खतरा, क्षमता एवं नाजुकता या संवेदनशीलता जैसे शब्दों का प्रयोग किया है तो आपको एक-एक कर उन सभी शब्दों का अर्थ भी समझ लेना चाहिए l

आपदा क्या है? (Aapda Kya Hai)


आपदा प्राकृतिक या मानव जनित कारणों से घटित घटना है, जो समाज के सामान्य जीवन को अचानक बाधित कर देती है तथा उससे जान-माल की क्षति होती है l

जोखिम क्या होता है? (Jokhim Kya Hai)


जोखिम प्राकृतिक या मानवजनित खतरों एवं नाजुक स्थितियों के मिलने से संभावित हानिकारक परिणाम या संभावित क्षति जैसे कि मौतें, चोट, आजीविका को नुकसान, आर्थिक गतिविधि में रूकावट आदि की संभावना को कहते हैं l

खतरा किसे कहते हैं? (Khatra Kya Hai)


वे सभी भौतिक घटनाएँ, परिघटना, मानवीय गतिविधि जो मौत या आघात, सम्पतियों के नुकसान, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवधान या पर्यावरण के नुकसान का कारण बन सकती है उसे ही खतरा कहा जाता है l

खतरा सिर्फ उसी हालत में आपदा बनता है, जब समुदाय की क्षमता इतनी कमजोर और नाजुक हो जाती है कि वह खतरों की प्रबलता का मुकाबला नहीं कर पाती l एक ही तरह का खतरा समुदाय पर उसकी नाजुकता स्थिति के हिसाब से अलग-अलग तरह का प्रभाव डालता है l

क्षमता किसे कहते हैं? (Kshamta Kya Hai)


जोखिम के स्तर या आपदा के प्रभावों को कम करने में मदद कर सकने लायक समुदाय, समाज या संगठन के पास उपलब्ध सभी शक्तियों, क्षमता एवं संसाधनों के योग को क्षमता कहते हैं l

नाजुकता या संवेदनशीलता क्या है?


नाजुकता शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय कारकों से उत्पन्न स्थिति का सम्मिलित रूप है, जो खतरों के प्रभाव के प्रति समुदाय की संवेदनशीलता को बढ़ाती है l

उपरोक्त सभी शब्दों की व्याख्या को आप निम्न उदाहरण से आसानी से समझ सकते हैं l

“एक तैराक नौजवान बिना लाइफ जैकेट पहने उफनाई नदी पार करने की कोशिश कर रहा था l वह नदी की तेज धारा में बह गया और पानी की तेज धारा में बने भंवर में पड़ जाने के कारण चक्करदार पानी ने उसे अन्दर खीँच लिया जिससे डूबकर उसकी मौत हो गई l”

यहाँ आप समझिये कि, खतरा बहती हुई उफनाई नदी का पानी है, लाइफ जैकेट का ना पहने होना नाजुकता है, तैरना क्षमता है, तेज धारा में बनने वाले भंवर के द्वारा युवक को अन्दर खिंचकर डुबा देना जोखिम है और नौजवान की मौत होना आपदा है l

आप यह भी गौर करें कि हम खतरे की प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते l तैरने की क्षमता से युक्त नौजवान आपदा से सिर्फ इसलिए प्रभावित हुआ क्योंकि उसने अपनी नाजुकता को कम नहीं किया अर्थात लाइफ जैकेट नहीं पहना जिसके कारण तैराक होने के बावजूद वह नाजुक था और जोखिम के गिरफ्त में आ गया l

मतलब साफ़ है, जोखिम का प्रभाव हमेशा नाजुक और गैर क्षमता युक्त चीजों पर पड़ता है l

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आपदा कितने प्रकार के होते हैं? (Aapda Kitne Prakar Ke Hote Hain)


आपदाओं का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है-
1. प्राकृतिक आपदा
2. मानव जनित आपदा

प्राकृतिक आपदा किसे कहते हैं? (Prakritik Aapda Kise Kehte Hain)


ऐसी आपदाएँ जो प्रकृति जनित है अर्थात जिसपर मनुष्य का कोई वश नहीं होता उसे प्राकृतिक आपदा कहते हैं l लोग इसे ईश्वरीय विपदा भी बोलते हैं l जैसे- भूकंप, बाढ़, चक्रवाती तूफान, आँधी, लू या गर्म हवा, शीतलहर, सुखाड़, वज्रपात, अगलगी आदि मुख्य प्राकृतिक आपदाएँ हैं l

मानव निर्मित आपदा क्या है? (Manav Nirmit Aapda Kya Hai)


मानव द्वारा पैदा की गई परिस्थितियाँ जिससे अपार जन-धन की क्षति होती है, लेकिन थोड़ी सावधानी बरतने से हम इन्हें रोक सकते हैं, मानव जनित आपदा कहलाता है l जैसे- सड़क, रेल एवं नाव दुर्घटना, भगदड़, जलवायु परिवर्तन, महामारी, रासायनिक एवं जैविक दुर्घटना, नाभिकीय एवं औद्योगिक दुर्घटना आदि मानव जनित आपदा की श्रेणी में आते हैं l

Aapda Prabandhan Ki Avashyakta Kyon Hai?


आपदा प्रबंधन की आवश्यकता क्यों है (Aapda Prabandhan Ki Avashyakta Kyon Hai?) इस बात को आपदा प्रबंधन के अर्थ से समझा जा सकता है l

आपदा प्रबंधन का अर्थ-


आपदा प्रबंधन सभी स्तरों पर आपदाओं के खतरे से होने वाली क्षति को कम करने के साथ-साथ संभावित क्षति न होने देने के उद्देश्य से की गई कार्रवाई है l आपदा का प्रबंधन इस प्रकार से होता है कि आपदा पीड़ितों को ससमय उपयुक्त सहायता पहुँच जाये और त्वरित गति के साथ प्रभावी तरीके से आपदा के विभिन्न तरह के प्रभावों से लोगों को निजात दिलाया जाए l

आपदा प्रबंधन चक्र-


आपदाओं के प्रभाव को कम करने हेतु आपदा प्रबंधन चक्र के अनुसार निर्धारित गतिविधियों को किया जाना आवश्यक है l सरकारी तंत्र, निजी क्षेत्र के लोग, सिविल सोसायटी तथा समुदाय को आपदा प्रबंधन चक्र के अनुसार निरंतर कार्य करने की आवश्यकता है तभी आपदाओं से निपटने और इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है l आपदा प्रबंधन चक्र निम्नरूपेण हैं–

आपदा प्रबंधन चक्र

तत्काल राहत/बचाव


तत्काल राहत/बचाव का कार्य आपदा आने के तुरंत बाद का समय होता है l आपदा से प्रभावित लोगों के लिए अस्थायी शरणस्थली, पेयजल, भोजन एवं स्वास्थ्य सेवा की जरूरतों को पूरा करने की कार्रवाई की जाती है l

पुनर्वास


आपदा पीड़ितों को सामान्य हालत में लौटने में मदद करने वाली कार्रवाई जैसे आवास, अनुदान, इलाज की सुविधा, मकानों की मरम्मति आदि मुहैया कराया जाना शामिल होता है l

न्यूनीकरण


आपदा से होने वाले जोखिमों के प्रबंधन, संकट को टालने तथा इसके कुप्रभावों से बचने के लिए तैयारी का उन्नत उपाय किया जाता है l

पूर्व तैयारी


पूर्व तैयारी का मतलब आपदाओं का प्रभावी जवाब सुनिश्चित करने के लिए पहले से की गयी कार्रवाई एवं उपाय है l इसमें समय पर पूर्व चेतावनी तथा अस्थायी रूप से लोगों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उनके संपति को भी बचाने का इंतजाम करना होता है l पूर्व तैयारी के क्रम में मोकड्रिल जैसी गतिविधियाँ भी शामिल है l

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 और उसकी खास बातें


भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के लागू होने के बाद आपदा प्रबंधन का परिदृश्य (Paradigm) बदल गया है l अब आपदा प्रबंधन मात्र रिलीफ केंद्र नहीं रह गया है अपितु आपदाओं की रोकथाम (Prevention), शमन (Mitigation), तैयारी (Preparedness), रिस्पांस (Response), पुनर्स्थापन (Rehabilitation) एवं पुनर्निर्माण (Reconstruction) आपदा प्रबंधन के महत्वपूर्ण घटक माने जा रहे हैं l शमन की अवधारणा भी बदल रही है एवं इसमें आपदा जोखिम न्यूनीकरण को प्रमुखता से शामिल किया गया है l

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के अंतर्गत देश में राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन की संरचना की कल्पना की गयी है l राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष माननीय प्रधानमंत्री होते हैं l राज्य स्तर पर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण है जिसके अध्यक्ष माननीय मुख्यमंत्री होते हैं l जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण होते हैं जिसके अध्यक्ष जिला पदाधिकारी और सह-अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष होते हैं l

अधिनियम में केंद्र एवं राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों तथा त्रि-स्तरीय प्राधिकरणों को आपदा प्रबंधन के सुपरिभाषित दायित्व सौपे गए हैं l

अधिनियम में आपदा को परिभाषित कर उसमें प्राकृतिक आपदाओं, मानव जनित आपदाओं एवं पर्यावरण क्षरण जनित आपदाओं को समाहित किया गया है l

निष्कर्ष-


सभी आपदाएँ अचानक नहीं आती, अपितु कतिपय आपदाएँ धीमी गति से भी प्रभाव डालता है l सूखा जैसी आपदा में ऐसी ही स्थिति होती है जिसके कारण आजीविका बचाने की लोगों की क्षमता कम हो जाती है l अक्सर, लोग जबतक इसके प्रभाव को महसूस करते हैं, तब तक काफी देर हो चुकी होती है l

भूकंप, तूफान, वज्रपात, अगलगी एवं सड़क दुर्घटना जैसी अचानक आने वाली आपदाएँ बगैर किसी चेतावनी के कहर बरपा जाती है l ऐसी स्थिति में जान-माल की व्यापक क्षति होती है l

अतएव विभिन्न आपदाओं से होनेवाले क्षति को कम करने हेतु आपदा प्रबंधन एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण के उपायों के द्वारा बच्चों, युवाओं, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों और उनके द्वारा समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है l

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