Gandhi 150: Short Life Story of Mahatma Gandhi in Hindi

Chandan 6:53 pm
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Short Life Story of Mahatma Gandhi in Hindi

Short Life Story of Mahatma Gandhi in Hindi

गुजरात राज्य का एक खुशहाल इलाका है सौराष्ट्र, जिसे काठियावाड़ भी कहते हैं l यहाँ समुद्र के किनारे बसा हुआ एक पुराना शहर है पोरबंदर l यहीं पर 2 अक्टूबर 1869 को मोहनदास करमचंद गाँधी (Mohandas Karamchand Gandhi) का जन्म हुआ l

Mahatma Gandhi Family


पुतलीबाई, मोहन की माँ, उसे प्यार से मोनिया पुकारती थी l

मोहन (महात्मा गाँधी) के पिता करमचंद ‘कबा’ गाँधी l उनके पिता की ही तरह राज-रजवाड़ों में ‘दीवान’ थे l दीवान अर्थात् रियासत के प्रधानमंत्री l करमचंद जी कभी स्कूल कॉलेज नहीं गए थे, पर उनकी सूझ-बूझ और नेकदिली में सभी का भरोसा था l वे हमेशा शुद्ध न्याय ही करते थे l धन बटोरने का लोभ उन्होंने कभी नहीं किया l

मोहन के भाई थे लक्ष्मीदास और करसनदास और बहन थी रलियात l मोहन सबसे छोटा था l

छुटपन में उसकी बहन रलियात उसे खूब खेलाती थी बहलाती थी l

ओखा नाम का एक लड़का उनके घर सफाई करने आता था l मोहन उससे दोस्ती करना चाहता l पर उसकी माँ कहती ओखा अछूत है, उसे छूना नहीं चाहिए l

वह पाँच साल का था जब उनका परिवार राजकोट चला आया l जल्दी ही उसके पिता वहां के दीवान बन गए l

राजकोट में मोहन नियमित पाठशाला जाने लगा l उसे स्कूल अच्छा नहीं लगता था l डर लगता था कि दूसरे उसपर हसेंगे, उसका मजाक उड़ायेंगे l जरुरत से ज्यादा बात किसी से नहीं करता, शिक्षकों से भी नहीं l घंटी बजते ही अन्दर घुसता और कक्षाएँ पूरी होते ही दौड़ता हुआ घर लौट जाता l उसकी किताबें और पाठ ही उसके दोस्त थे l

मोहन एक मामूली छात्र था l न तो बहुत होशियार और न एकदम फिसड्डी ही l हाँ, उसने कभी शिक्षकों या सहपाठियों से झूठ नहीं बोला l यह उससे होता ही नहीं था l

एक बार उसे अध्यापक महोदय ने खुद नक़ल करने के लिए कहा l लेकिन यह बात उसे समझ ही नहीं आई l

एक बार उसने अपने पिता की लाई एक किताब पढ़ी l उसमें माता-पिता की सेवा करने वाले श्रवण कुमार की कहानी थी l जिसे बाद में उसने एक चलचित्र में भी देखा l मोहन एकदम श्रवण कुमार जैसा बनना चाहता था l

मोहन के माता-पिता सत्य और धर्म को हमेशा ही मानते थे l उसने देखा था कि वे सच्चाई के लिए बहुत कुछ त्याग सकते थे l उसके ऊपर श्रवण कुमार और राजा हरिश्चंद्र की कहानियाँ ! सत्य की ताकत मोहन के मन में और गहरी बैठ गई थी l

Mahatma Gandhi Wife Name


मोहन (Mahatma Gandhi) का ब्याह 13 साल की उम्र में कर दिया गया l उसकी पत्नी कस्तूरबाई उम्र में मोहन से कुछ महीने बड़ी ही थी l शुरू में दोनों एक-दूसरे से लजाते थे l फिर मोहन को लगा कि उसे खेलने के लिए एक नई दोस्त मिल गई l

कस्तूरबाई एकदम अनपढ़ थी l मोहन उसे अपनी किताबों से पढ़कर सुनाता था l उन दिनों लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता था l मोहन की कुछ कोशिशों के बावजूद कस्तूरबाई जीवन भर ठीक से पढ़ना-लिखना नहीं सीख सकी l

Mahatma Gandhi Education


शादी की वजह से मोहन की एक साल की पढाई बिगड़ गई थी l लेकिन एक अध्यापक ने उसपर भरोसा किया और उसे एक कक्षा आगे डलवा दिया l

कभी-कभी, जब विद्यालय मोहन को कोई पुरस्कार या वजीफा देता, तो उसे अचरज होता l वह बहुत होशियार चाहे न रहा हो, लेकिन मेहनती था, ईमानदार था l सभी अध्यापक उसके लिए स्नेह रखते थे l पढाई का डर उसके मन से जा चुका था l

उसमें एक कमी थी जिसकी कीमत उसने जीवन भर चुकाई l यह थी बिगड़ी हुई लिखावट l उसे यह ग़लतफ़हमी हो गई थी कि साफ-सुथरी लिखाई का शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है l

बड़े होने के बाद गांधीजी ने अपनी ख़राब लिखावट सुधारने की कई बार कोशिश की l लेकिन बचपन की बिगड़ी आदत फिर ठीक नहीं हुई l उनका लिखा हुआ पढ़ना मुश्किल होता l जब दूसरों के मोती के दानों जैसे साफ़ और सुन्दर अक्षर दिखते, तब गाँधीजी को पछतावा होता l

“ख़राब अक्षर अधूरी शिक्षा की निशानी मानी जानी चाहिए......हर एक नवयुवक और नवयुवती मेरे उदहारण से सबक ले और समझे कि अच्छे अक्षर विद्दा का आवश्यक अंग है l” - Mahatma Gandhi

करमचंदजी की तबीयत बिगड़ती ही चली गई l जब उनका देहांत हुआ, तब मोहन 16 बरस का था l

दीवान पिता की मृत्यु से गाँधी परिवार की माली हालत डगमगा गई थी l पढ़ने के लिए मुंबई के कॉलेज जाना महँगा था, सो 18 साल के मोहन ने भावनगर में दाखिला ले लिया l

कॉलेज की पढाई में मोहन का मन नहीं लगा, सब कुछ मुश्किल लगता था l एक दिन करमचंदजी के एक पुराने दोस्त और सलाहकार उनसे मिलने आये l नाम था मावजी दवे l वे अपने मित्र के देहांत के बाद भी उसके परिवार से संबंध रखते थे l उन्होंने मोहन की माँ और बड़े भाई से कहा –

“जमाना बदल गया है l तुम भाइयों में से कोई कबा गाँधी की गद्दी संभालना चाहे तो बिना पढाई के वह नहीं होगा l मोहन अभी पढ़ रहा है, इसलिए गद्दी सँभालने का बोझ इससे उठवाना चाहिए l बी. ए. करने में इसे चार पाँच साल लग जायेंगे l इतना समय देकर भी इसे दीवानगिरी नहीं मिलेगी , 50-60 रूपये की नौकरी ही मिलेगी l आपको मोहन को विलायत भेजना चाहिए l मेरा बेटा कहता है कि वहां की पढाई सरल है l उसके वहां कई दोस्त है, उनके नाम सिफारिशी पत्र दे देगा तो इसे वहां कोई कठिनाई नहीं होगी l तीन साल में पढ़कर लौट आएगा l खर्च भी ज्यादा न होगा l नए आये हुए बैरिस्टरों को देखो, कैसे ठाट से रहते हैं l वे चाहे तो उन्हें दीवानगिरी आज मिल सकती है l”

“डॉक्टर बनकर तू दीवान नहीं बन सकेगा l मैं तो तेरे लिए दीवान का पद या उससे भी अधिक चाहता हूँ l तभी तुम्हारे बड़े परिवार का निर्वाह हो सकेगा l बैरिस्टर बनने में ही बुद्धिमानी है l”

मोहन के बड़े भाई ने उसके विदेश जाने के लिए धन का इंतजाम कर दिया l 4 सितम्बर 1887 को मोहन पानी के जहाज से इंग्लैंड रवाना हो गया l

Mahatma Gandhi Achievements


1891 में बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी कर भारत लौटे l मुंबई में घर किराये पर लिया और वकालत शुरू की l लेकिन बड़े भाई के कोशिशों के बाद भी मोहनदास के पास कोई अपना काम लेकर आता नहीं था l

25 मई 1893 को मोहनदास वकालत के लिए दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर पहुँचे l उन्हें लेने दादा अब्दुल्ला आये थे, जो आगे चलकर मोहनदास के करीबी सहयोगी बने l

बंदरगाह पर ही मोहनदास ने देखा कि वहाँ के गोरे लोग भारतीय लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं l इसे दादा अब्दुल्ला भी चुपचाप सहन कर रहे थे l

दक्षिण अफ्रीका में हिन्दुस्तानी मजदूरों को ‘कुली’ कहा जाता था l मोहनदास को गोरे लोग कुली बैरिस्टर’ कहते थे l

पहला काम था मुकदमा समझना l इसके लिए वहाँ पहुँचने के हप्ते भर बाद ही मोहनदास प्रिटोरिया नामक शहर के लिए रेलगाड़ी से अव्वल दर्जे का टिकट लेकर रवाना हुए l

रेलगाड़ी जब पीटरमैरित्स्बर्ग पहुँची, तो एक गोरे यात्री ने अफसर से शिकायत की कि एक काला आदमी अव्वल दर्जे में क्यों बैठा है l

अफसर ने मोहनदास से पिछले डिब्बे में जाने को कहा, निचले दर्जे में l मोहनदास ने उन्हें अपना अव्वल दर्जे का टिकट दिखाते रहे, और जाने से मना कर दिया l

नहीं मानने पर अफसर ने पुलिस के सिपाही को बुलाया, जिसने धक्के देकर गाँधीजी को प्लेटफार्म पर उतार दिया l उनका सामान भी वहीँ फ़ेंक दिया l

उनका मन तो हो रहा था कि ऐसे अपमान में जीने से बेहतर वापस अपने देश लौट जाएँ l फिर लगा कि यह अपमान तो ऊपरी है, इसके पीछे गहरा अन्याय है l रंगभेद का अन्याय, जो इन्सान को उसकी चमड़ी के रंग से तौलता है l

हिन्दुस्तानियों को कई जुल्म सहने पड़ते थे l रात को बिना पहचान पत्र बाहर नहीं निकल सकते थे l चुनाव में ज्यादातर भारतीय वोट नहीं डाल सकते थे l

पर सबसे बुरे हाल तो अनपढ़ मजदूरों के थे l उनके गोरे मालिक उन्हें गुलामों की तरह रखते थे, जब चाहें, उन्हें पीट देते थे l उनपर नए कर भी लगाये जा रहे थे l

ये मजदूर 1860 के बाद तमिलनाडु, आन्ध्रा और बिहार जैसे राज्यों से गन्ने की खेती के लिए आये थे l इनसे अग्रीमेंट यानी इकरारनामा होता था, इसलिए ये ‘गिरमिटिया’ कहलाने लगे l

गाँधीजी का नाम सुनकर बालासुंदरम नामक एक मजदूर मोहनदास से मदद मांगने आया l उसके गोरे मालिक ने उसे बुरी तरह पीट दिया था, दो दांत तोड़ दिए थे l

उसका ईलाज कराकर मोहनदास उसे एक मजिस्ट्रेट के पास ले गए l उसकी मुक्ति हुई l गाँधीजी गिरमिटिया मजदूरों के नेता हो गए l

1904 में ‘फिनिक्स बस्ती’ बनाई l

1906 में ‘सत्याग्रह’ की शुरुआत की l

1909 में ‘हिन्द स्वराज’ लिखी l

1910 में ‘टॉलस्टॉय फार्म’ बनाया l

1914 में हमेशा के लिए भारत लौट गए l

इसके बाद शुरू होता है महात्मा गाँधी का भारत में भारतीयों के लिए और अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ आन्दोलन और आजादी की कहानी l लेकिन यह कहानी भी काफी लम्बी है जिसे हम संक्षिप्त में आप सबों से साझा कर रहें हैं l

Mahatma Gandhi Movements

Mahatma Gandhi Movements


भारत लौटने के बाद गाँधीजी देश भर में घूमते रहे l लोगों की हालत उनके पास जाकर समझते रहे l हिंदुस्तान की दुर्दशा को करीब से समझने लगे l

आखिर में वे अहमदाबाद में बसे और यहाँ सत्याग्रह आश्रम बनाया l

यहाँ पर जुलाहों को बुलाकर गाँधीजी ने अपने हाथ से कपड़ा बनाना सीखा l

अब गाँधीजी कांग्रेस के कामकाज में हिस्सा लेने लगे थे l कांग्रेस नेताओं के कहने से चंपारण के एक किसान गाँधीजी को बिहार लेकर आए l किसान नील के व्यापारियों से बहुत परेशान थे l

लंदन में उनके साथ पढ़े हुए वकीलों की गाँधीजी ने मदद ली l निलहों के अत्याचारों पर रपट तैयार कर के सरकार पर जोर डालना था कि वह कानून बदले l

वकील किसानों का मामला लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहते थे l गाँधीजी सत्याग्रह के तरीके सीख चुके थे l उन्होंने एक अलग रास्ता सुझाया l


“जहाँ रैयत इतनी कुचली गई है, जहाँ सब इतने भयभीत रहते हैं, वहाँ कचहरियों की मार्फ़त थोड़े ही इलाज हो सकता है l लोगों के लिए सच्ची दवा तो उनके डर को भगाना है l” - Mohandas Karamchand Gandhi

किसानों से मिलकर गाँधीजी उनका दुःख-दर्द पूछने लगे l अपनी रपट तैयार करते गए l

वे सर्वेक्षण कर रहे थे जब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया l

अदालत में गाँधीजी ने एकदम निडरता से कहा कि वे चंपारण नहीं छोड़ेंगे l

बाहर असंख्य लोग गाँधीजी के समर्थन में जमा थे l दबाव में आकर मजिस्ट्रेट ने उन्हें छोड़ दिया l

लगभग आठ महीने गाँधीजी चंपारण में रहे l दक्षिण अफ्रीका की ही तरह यहाँ भी सत्य की जीत हुई, अंग्रेज सरकार ने घुटने टेके l किसानों को परेशान करने वाली नील की खेती का अंत हुआ l

चंपारण सत्याग्रह की सफलता ने गाँधीजी को कांग्रेस के मुख्य नेताओं के आगे खड़ा कर दिया l

चंपारण की ही तरह गुजरात के खेड़ा में भी किसानों ने सत्याग्रह किया l वकील सरदार पटेल अब कांग्रेस के नेता बन चुके थे l

अहमदाबाद में कपड़ों के कारखानों के मजदूरों ने हड़ताल कर दी थी l उनकी नेता थी कारखानों के मालिक की बहन अनसूया साराभाई l

मजदूरों के लिए गाँधीजी ने यहाँ उपवास किया l फिर ऐसा समझौता कराया, जो सबको मंजूर था l

1921 में ऐसे कई विरोधों के मिलने से असहयोग आन्दोलन उभर कर सामने आया l यह पूरे देश में फ़ैल गया l अब आजादी की लड़ाई के मुख्य नेता गाँधीजी ही थे l

1930 में नमक सत्याग्रह शुरू हुआ, जो और भी बड़ा आन्दोलन था l

1942 में सबसे बड़ा आन्दोलन शुरू हुआ – भारत छोड़ो आन्दोलन l अब अंग्रेजों के लिए भारत पर राज करना मुश्किल था l

1944 में कस्तूरबा का निधन हो गया l

1944 में रेडियो पर एक भाषण में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने पहली बार गाँधीजी को एक विशेष नाम से पुकारा – राष्ट्रपिता l

गाँधीजी तो अपने दो सबसे प्रिय हथियारों की ही बात करते रहे – सत्य और अहिंसा l

1947 में इंग्लैंड से भारत को आजादी मिली, 14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत l

1948 में 30 जनवरी को प्रार्थना में जाते हुए महात्मा गाँधी को दिल्ली में गोली मार कर हत्या कर दी गई l

Mahatma Gandhi Quote

बापू की यह कहानी. जन शिक्षा निदेशालय, शिक्षा विभाग, बिहार सरकार द्वारा प्रकाशित “बापू की पाती” शीर्षक किताब से ली गई है l इसके लिए बिहार सरकार धन्यवाद के पात्र हैं जिसके बदौलत महात्मा गाँधी के Short Life Story को स्कूली बच्चों को उपलब्ध कराया साथ ही अब lovehindi.com के माध्यम से हर जन तक पहुँच सकेगा और लोग गाँधीजी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने के लिए प्रेरित होंगे l

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