Nios Deled Assignment 506 in Hindi - (सत्रीय कार्य -1)

Chandan 3:12 pm
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COURSE 506
ASSIGNMENT - 1 (सत्रीय कार्य -1)
Q.1. कारण लिखिए कि शिक्षक के लिए अनुवांशिकता एवं वातावरण के भूमिका को जानना क्यों महत्वपूर्ण हैं ?
Write reason, why it is important to know the relative role of heredity and environment for a teacher?


ANS. - शिक्षा, बच्चे के वृद्धि एवं विकास से महत्वपूर्ण रूप से जुड़ी होती है l बच्चे का सर्वांगीण विकास करना, उनकी क्षमताओं का विकास करना शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है l यह कहा जाता है कि बच्चा कुछ जन्मजात शक्तियों के साथ पैदा होता है जिनका विकास समुचित वातावरण में शिक्षा द्वारा किया जाता है l अनुवंशिकवाद कहता है कि आनुवंशिकता ही सब कुछ है तथा आनुवंशिकता ही एक व्यक्ति के सभी गुणों का निर्धारण करती है l आनुवंशिकता किसी व्यक्ति के जन्म के साथ मिले गुणों का योग है l इसके अतिरिक्त, वातावरण के अंतर्गत वे सभी कारक हैं जो बच्चे को सीखने के लिए प्रभावित करते हैं l गर्भाधान के बाद बच्चे का विकास कैसा होगा, यह आनुवंशिकता और वातावरण के बीच की अंतर्क्रिया पर निर्भर करता है l अनुसंधान बताते हैं कि प्रत्येक गुण के विकास के लिए आनुवंशिकता तथा वातावरण दोनों ही जिम्मेदार है l दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि आनुवंशिकता तथा वातावरण एक दूसरे के पूरक हैं और एक ही सिक्के के दो पहलु हैं l 

एक शिक्षक के लिए आनुवंशिकता एवं वातावरण की भूमिका का ज्ञान बहुत ही महत्वपूर्ण हैं ताकि वह अधिगम को अच्छी तरह समझने में अपने विद्यार्थियों की सहायता कर सके l उसे बच्चे, उनकी योग्यताएं और साथ-ही-साथ उनके पर्यावरण का अध्ययन करना चाहिए तथा उन्हें विकास के लिए योजना अवश्य बनानी चाहिए l इस सन्दर्भ में Sorenson ने ठीक ही चिन्हित किया है कि शिक्षक के लिए ज्ञान, आनुवंशिकता की शक्तियों का सापेक्षिक प्रभाव, और मानवीय विकास का पर्यावरण और उनके अन्तः संबंधों का एक महान अभिप्राय है l शैक्षिक उपलब्धि का उच्च स्तर विद्यालय के वातावरण पर निर्भर करता है l यदि उनकी आनुवंशिकता और पर्यावरण ज्ञात है तो सभी प्रकार के असाधारण बच्चों (जैसे- प्रतिभाशाली, सामान्य, औसत, दिव्यांग बच्चे, शैक्षिक रूप से पिछड़े बच्चे और प्रथम पीढ़ी के अधिगमकर्ता) का सामना करने में शिक्षकों को आसानी होती है l 

शिक्षकों के लिए आनुवंशिकता और वातावरण के ज्ञान की अनिवार्यता के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं – 
1. अधिगमकर्ता की पृष्ठभूमि जैसे कि पूर्व ज्ञान, बुद्धि, पारिवारिक पृष्ठभूमि, रूचि का अभाव, अभिरुचि और मनोवृति एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है l उपलब्धि के अन्य क्षेत्रों में कुछ बेहतर करने में कुछ विद्यार्थी पिछड़े रह जाते हैं अतः शिक्षक को विद्यार्थियों के लिए एक संज्ञानी वातावरण अवश्य प्रदान करना चाहिए तथा उनके साथ समान व्यवहार करना चाहिए l पर्यावरण के साथ समंजन करने में शिक्षक को उन्हें प्रेरित करना चाहिए l 

2. कुछ व्यक्ति हैं जो बहुत से कारकों के कारण समूह के मानदंडों से विचलित हो जाते हैं l अतः शिक्षक को अपने शिष्यों की योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों, मनोवृतियों, अभिरुचियों और अन्य विशेषताओं को जानने की कोशिश करनी चाहिए और इस ज्ञान की प्रकाश में उन्हें उनकी अन्तःशक्तियों की अधिकतम उपयोगिता के लिए वैयक्तिक दिशा-निर्देश देना चाहिए l
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3. कक्षा कक्ष में विभिन्न शिक्षण विधियों को अपनाना चाहिए l यह विभिन्न व्यक्तियों को उनकी रुचियों और समझ के स्तर के अनुसार जरूरतों को पोषित करने में सहायता करता है l 

4. विद्यालय व्यक्तित्व विकास के लिए होना चाहिए l विद्यालय को नेतृत्व, समूह गतिकी, आनुवंशिकता को पृष्ठभूमि में रखने और अधिगमकर्ता के पर्यावरण पर कार्यक्रमों को आयोजित करना चाहिए l प्रत्येक विद्यालय का एक दिशा-निर्देश और परामर्श केंद्र भी होना चाहिए l और यह सभी शिक्षकों के लिए तभी संभव है जब वे आनुवंशिकता और वातावरण से पूर्ण रूप से परिचित हों l 

5. पर्यावरण में विविध प्रकार की शक्तियां जैसे – भौतिक, सामाजिक, नैतिक, भावात्मक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक शक्तियाँ होती है l एक अनुकूल वातावरण बच्चे की जन्मजात योग्यताओं के विकास को पोषित करता है l इसलिए शिक्षकों को उत्तम मानसिक पर्यावरण, कार्यशाला, संग्रहालय, क्लब, संगठन, वाद-विवाद, गोष्ठी आदि प्रदान करने की कोशिश करनी चाहिए और उन्हें अवश्य प्रोत्साहित करना चाहिए l 

6. आनुवंशिकता को जैविक रूप से संप्रेषित कारकों की सम्पूर्णता के रूप में परिभाषित किया गया है जो शरीर की संरचना को प्रभावित करता है और पर्यावरणीय स्थितियों की सम्पूर्णता है जो व्यवहार को प्रेरित है या व्यवहार में बदलाव लाने का कार्य करता है l अतः आनुवंशिकता और पर्यावरण दोनों एक व्यक्ति के जीवन में महत्पूर्ण हैं, दोनों विकास के निर्धारक हैं l 

उपरोक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि आनुवंशिकता और पर्यावरण अध्ययन वैयक्तिक विभिन्नता के आकस्मिक कारकों को समझने में शिक्षकों को समर्थ बनाता है और अधिगम में विविधताओं को न्यूनतम करने में कक्षा-कक्ष निर्देशन देता है तथा कक्षा-कक्ष शिक्षण में समान अवसरों को प्रदान करता है l शिक्षक अनुकरणीय शिक्षण विधि अपना सकता है, उपर्युक्त शिक्षण सामग्री का प्रयोग कर सकता है और वृहद् स्तर पर अधिगमकर्ताओं को प्रेरित कर सकता है l

COURSE 506 ASSIGNMENT -1 (सत्रीय कार्य -1) QUESTION NO. 2 IN HINDI

Nios Deled Assignment 506 in Hindi
Q.2. क्या आप महसूस करते हैं कि हमारे समाज में लैंगिक भेदभाव व्याप्त है ? अपने उत्तर के पक्ष में समुचित उदहारण दीजिये l 
Do you feel gender discrimination exists in our society? Justify your answer with suitable examples.


ANS. समाजीकरण के पश्चात् स्त्रियों और पुरुषों के विकसित व्यक्तित्व को हम लिंग (Gender) कहते हैं l  यह समाज द्वारा बनाया गया सामाजिक व्यवस्था है l समाज स्त्री और पुरुषों के लिए अलग-अलग भूमिका निर्धारित करती है l स्त्री और पुरुष द्वारा किये गए कार्यों का आकलन भी अलग-अलग ढंग से करते हैं l यह स्त्रियों और परुषों पर अलग-अलग ढंग से अंकुश लगाता है l इस प्रकार जेंडर उन गुणों, आदर्शों और कार्यों का निरूपण है जिन्हें स्त्रियों और पुरुषों से समाज उम्मीद करता है l जेंडर समय-समय पर और एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में परिवर्तित होता रहता है l आज भी हमारे समाज में यह लैंगिक भेदभाव काफी अधिक व्याप्त है l 

समाज सामान्यतः लड़कियों को कोमल, सुसंस्कृत, विनीत और आज्ञाकारी होने की आशा करता है l और लड़कों को आक्रामक, सुदृढ़, कठोर, साहसी आदि होने की उम्मीद रखते हैं l लड़के के जन्म होने पर बड़े धूमधाम से उनके जन्मदिवस को मनाते हैं जबकि लड़कियों के जन्म पर ख़ुशी नहीं मनाते हैं l हम लड़के और लड़कियों का लालन पालन अलग-अलग ढंग से करते हैं l हम लड़के और लड़कियों की प्रशंशा या दण्ड अलग-अलग कारणों से देते हैं l हम लड़के और लड़कियों के खिलौने अलग-अलग उपलब्ध कराते हैं l लड़कों को घर के बाहर घूमने फिरने के लिए प्रेरित किया जाता है जबकि लड़कियों को घर के अन्दर रहने के लिए प्रेरित किया जाता है l 
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लैंगिक भेदभाव का तो ये सभी बहुत ही संक्षिप्त उदहारण है , जबकि आज भी हमारे समाज में यह भेदभाव वृहद् स्तर पर व्याप्त है जिसे नीचे के उदाहरणों से समझा जा सकता है – 
1. लिंग अनुपात :- समाज में लैंगिक भेदभाव का सबसे बड़ा उदहारण लिंग अनुपात है l प्रत्येक 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या को लिंग अनुपात कहा जाता है l किसी भी समाज में प्रत्येक 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या भी 1000 होनी चाहिए l दुर्भाग्यवश हमारे देश में लिंग अनुपात लगातार कम होता जा रहा है l यह स्थिति शहरी इलाकों में और भी खतरनाक है l शिशु लिंगानुपात तो और भी विचारणीय है l इसका कारण या तो बालिका भ्रूण हत्या या उचित देखभाल के अभाव के कारण बालिकाओं का उच्च मृत्यु दर है l 1901 से 2011 के जनसंख्या रिपोर्ट में लिंग अनुपात में लगातार गिरावट का मुद्दा सामने आया l शहरी क्षेत्रों में लिंग अनुपात में गिरावट ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक है l 

2. शिक्षा :- परिवार और समाज में स्त्रियों की दशा का सीधा संबंध शिक्षा से है l जेंडर समानता और सशक्तिकरण के लिए शिक्षा एक मूलाधार सूचक है l लेकिन साक्षरता दर में बहुत बड़ा जेंडर अंतराल है l साक्षरता दर केवल एक सूचक है l कुछ और सूचक है जिसमें प्रवेश की दर शामिल है, विद्यालय छोड़ने की दर और विभिन्न ग्रेड स्तर पर लड़कियों की संख्या भी शामिल है l 2011 की जनगणना के हिसाब से भारत में पुरुषों की साक्षरता दर 82.14% है तो महिलाओं की साक्षरता दर 65.46% है l इतना ही नहीं यहाँ 40% से अधिक लड़कियां 10वीं के बाद स्कूल छोड़ देती है l जैसे-जैसे शैक्षिक स्तर ऊपर जाते हैं तो लड़कियों की संख्या कम होती जाती है l 

3. स्वास्थ्य :- आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य दशा में भी जेंडर अंतराल विद्यमान है l स्वास्थ्य सुविधाओं तथा स्वास्थ्य परिणाम में जेंडर भेदभाव स्पष्ट दिखाई देता है l नवजात बालिकाओं की मृत्यु दर सभी आयु वर्ग में सबसे अधिक है l भारत में स्त्रियों की औसत पौष्टिक ग्रहणशीलता लगभग 1400 कैलोरी प्रतिदिन है जबकि आवश्यक जरुरत लगभग 2200 कैलोरी है l कई लडकियाँ और स्त्रियाँ खून की कमी, पौष्टिकता का अभाव और कम वजन से ग्रसित है l 

लड़कियों की शादी की न्यूनतम वैधानिक आयु 18 वर्ष है l वैधानिक नियमों के वावजूद भारत में कई लड़कियों को 18 वर्ष की आयु पूरा होने से पूर्व ही शादी कर देते हैं l कम उम्र में गर्भधारण से कई प्रकार की समस्या से दो चार होना पड़ता है l गर्भपात होना, कम वजन का बच्चा पैदा होना या कभी कभी तो मृत बच्चा भी पैदा हो जाता है l और यह समस्या उन माताओं के साथ अधिक होता है जो शारीरिक कमजोरी और अपौष्टिकता से ग्रसित है l लगभग 12% स्त्रियाँ प्रजनन संबंधी बिमारियों से ग्रसित है l लगभग 300 स्त्रियाँ गर्भ व प्रसव संबंधी कारणों से प्रतिदिन मृत्यु का शिकार होती है l औसत जीवन दर भी पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की कम है l 

4. कार्यदल में भागीदारी :- कार्यस्थल पर जेंडर असमानता देखा जा सकता है l कार्य में स्त्रियों की भागीदारी से संबंधित आंकड़े बताते हैं कि कार्यदल में स्त्रियों की भागीदारी की दर बहुत कम है l अधिकांश स्त्रियाँ असंगठित क्षेत्रों में जैसे – कृषि में, दैनिक मजदूर के रूप में, भवन सड़क के निर्माण के क्षेत्र में या कम वेतन पाने वाले नौकरी कर रहे हैं l 

लैंगिक असमानता से जुड़ा हुआ एक और मुद्दा है असमान वेतन l एक ही कार्य करने के बावजूद स्त्रियों को पुरुषों के मुकाबले कम वेतन दिया जाता है l हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की वेतन संबंधी समानता में कुछ उन्नति हुई है फिर भी उनको पूरा अधिकार नहीं मिला है l स्त्रियों के नाम पर शायद ही कोई अचल संपति हो l यदि होगा भी तो उनका उन संपत्तियों पर बहुत कम नियंत्रण होता है l इससे समाज में लैंगिक भेदभाव का स्पष्ट पता चलता है l
5. अत्याचार और नृशंसता :- महिलाओं के प्रति हिंसा, अत्याचार और नृशंसता लैंगिक भेदभाव का सूचक है l कुछ ऐसे अपराध हैं जो सिर्फ स्त्रियों को लक्ष्य करके किया जाता है l जैसे – बालिका भ्रूण हत्या, बालयौन शोषण, लड़कियों से छेड़छाड़, दहेज़, बाल विवाह, बालात्कार, वंचित रखना, स्त्री तस्करी, वेश्यावृति में धकेलना, जबरदस्ती गर्भपात कराना, घरेलू हिंसा आदि कुछ ऐसे ही अपराध हैं जिसे स्त्रियों के विरुद्ध किया जाता है l National Crime Record Bureau के 2016 के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ हिंसा पिछले वर्षों के मुकाबले 3% ज्याद हुआ है तो बालात्कार के मामलों में यह 12% अधिक है l घरेलू हिंसा और घर के चारदीवारी के भीतर होने वाली हिंसा लगातार बढ़ रही है l 

उपरोक्त सभी उदहारण यह साबित करता है कि आज भी हमारे समाज में लैंगिक भेदभाव की जड़ें गहरी समायी हुई है जिनका निदान होने में काफी वक्त लग सकता है l




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