COURSE 509 KA ASSIGNMENT 3 KA ANSWER 1000 WORDS ME

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Q. सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा की व्याख्या कीजिए l सामाजिक विज्ञान में आप अपने विद्यार्थियों के लिए सतत और व्यापक मूल्यांकन का उपयोग कैसे करते हैं ? अपने स्वयं के अनुभवों पर आधारित उदाहरणों द्वारा स्पष्ट कीजिए l 
Explain the concept of Continuous and comprehensive evaluation (CCE). How will you use CCE for your learner in social science? Explain through examples based on your experiences. 
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उत्तर - 
सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की अवधारणा – CCE अर्थात् सतत एवं व्यापक मूल्यांकन, मूल्यांकन की ऐसी प्रक्रिया है जो विद्यालय आधारित है और जिससे विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य निर्धारित होता है l यह पद तीन कुंजी शब्दों (KEYWORDS) से मिलकर बना है – पहला सतत, दूसरा व्यापक और तीसरा मूल्यांकन l

“सतत” शब्द का तात्पर्य पूरे शैक्षिक सत्र में बालकों के अधिगम एवं प्रगति की लघुतम अंतराल पर संभावित नियतकालिक, नियमित रूप से की जाने वाली निगरानी से है, जिससे उनकी वर्तमान स्थिति, शक्तियों और अतिरिक्त निवेशों की आवश्यकता और / या अधिगम विकास और प्रगति के सीमाओं को बढ़ाने के लिए हस्तक्षेप से है l

“व्यापक” शब्द का तात्पर्य है कि पाठ्यक्रम विषय, पाठ्यक्रम क्रियाकलापों, सामाजिक-वैयक्तिक गुण, कार्य और कला शिक्षा आदि को मूल्यांकन समावेश करता है l इसके अंतर्गत विविध श्रोतों जैसे विद्यालय आलेखों, सहपाठी समूहों, अभिभावकों, शिक्षकों, विविध उपकरणों और तकनीकों जैसे- अवलोकन, साक्षात्कार, वृतचित्र विश्लेषण आदि के प्रयोग से एकत्रित की गयी दोनों गुणात्मक और परिमाणात्मक सूचनाएँ आती हैं l

“मूल्यांकन” शब्द का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें बालक के व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त करना; प्राप्त सूचनाओं की व्याख्या करना; बालक की प्रगति के संबंध में निर्णय करना; और अगली कक्षा में पदोन्नति के संबंध में निर्णय लेना शामिल है l

इस प्रकार, CCE अर्थात् सतत एवं व्यापक मूल्यांकन एक ऐसी विकसित प्रणाली है जिससे प्रत्येक बालक का उनकी योग्यता अनुसार विकास संभव है l यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे प्रत्येक बालक का अधिगम सशक्त और बेहतर बन सकता है l इसलिए CCE की सूत्रपात के लिए कई आयोगों, शिक्षा नीतियों, कार्य योजनाओं और कानूनों में भी प्रावधान किया गया l विभिन्न आयोगों, नीतियों और कानूनों में CCE के लिए जो सुझाव दिया गया उनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है l
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1. शिक्षा आयोग (1964-66) ने इंगित किया है कि मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है और सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली का एक आवश्यक अंग के रूप में होता है, शिक्षा के उद्देश्यों से घनिष्ठता से संबद्ध होता है l इस प्रकार मूल्यांकन की तकनीकें वैध, विश्वसनीय, वस्तुनिष्ट और व्यावहारिक होनी चाहिए और विद्यार्थियों का आकलन करते समय विविध तकनीकों का पालन किया जाना चाहिए l

2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) विद्यालयी शिक्षा के सभी स्तरों पर सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) की आवश्यकता की सम्भावना का ध्यान करती है, जिसमें शिक्षा के दोनों पहलू शैक्षिक तथा गैर-शैक्षिक सम्मिलित किया जाता है जिसका विस्तार निर्देश की सम्पूर्ण कालावधि में होता है l

3. प्रोग्राम ऑफ़ एक्शन (1992) CCE की अवधारणा को पुनः व्यक्त करता है और राष्ट्रीय परीक्षा सुधार रुपरेखा के द्वारा परीक्षा निकायों को निर्देश समूह के रूप में सेवा करने का आह्वान करता है, जो नवाचार को स्वतंत्रता देंगे और विशिष्ट परिस्थिति के अनुकूल रुपरेखा भी अपनाएंगे l

4. राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रुपरेखा (2005) सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का सुझाव देता है और विद्यालय स्तर पर आकलन प्रक्रियाओं में लोच शीलता की सलाह देता है, और विद्यार्थियों के आकलन कार्य पर जोर देता है l

5. RTE ACT (2009) ने प्राथमिक स्तर की शिक्षा तक CCE के प्रयोग को क़ानूनी रूप से आवश्यक बना दिया है l खण्ड 29 (1) कहता है कि पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रक्रियाओं में CCE को अपनाये जाने से विद्यार्थियों को भय, मानसिक आघात और चिंता से मुक्त हो सकेंगे l और खण्ड 3 (1) के अनुसार प्राथमिक शिक्षा के पूर्ण होने तक किसी विद्यार्थी को बोर्ड परीक्षा उतीर्ण करने की आवश्यकता नहीं होगी l
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उपरोक्त प्रावधानों, सुझावों, कार्य नीतियों, कानूनों के आधार पर सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) के निम्नांकित उद्देश्य परिलक्षित होते हैं –
(i) मूल्यांकन को शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का अभिन्न अंग बनाना l
(ii) मूल्यांकन का प्रयोग बालक के अधिगम और प्रगति के उपकरण के रूप में करना l
(iii) स्व-अधिगम के साथ ही साथ स्व-मूल्यांकन को प्रोत्साहित करना l
(iv) अध्येता के विकास, अधिगम प्रक्रिया, अधिगम गति और अधिगम क्रियाकलापों के सन्दर्भ में सटीक निर्णय करना l
(v) परीक्षा संबंधी चिंता, भय, मानसिक आघात, तनाव या फोबिया को छात्रों से दूर करना l
(vi) विद्यालय आधारित मूल्यांकन को स्थायी बनाना l
(vii) बाह्य परीक्षाओं को हतोत्साहित करना l

सामाजिक विज्ञान में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का उपयोग – एक व्यापक मान्यता है कि सामाजिक विज्ञान केवल सूचना प्रसारित करता है l यह पुस्तक केन्द्रित होता है और परीक्षाओं हेतु इसे रटने की आवश्यकता होती है l इतना ही नहीं इन पुस्तकों को तथा इनके विषय वस्तु को दैनिक वास्तविकता से असंबद्ध माना जाता है l इन सभी बातों से सामाजिक विज्ञान का ‘फालतू विषय’ होने जैसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है l जबकि हकीकत में ये बातें सही नहीं है l ये सारी बातें इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि व्यक्ति सामाजिक विज्ञान के अधिगम उद्देश्यों से अपरिचित होते हैं l

सामाजिक विज्ञान में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए, इसके लिए सबसे पहले इसके शिक्षण उद्देश्यों को समझना जरुरी है l National Focus Group on Teaching Social Science, अर्थात् राष्ट्रीय अभिकेंद्रित समूह का सामाजिक विज्ञान शिक्षण पर स्थिति प्रपत्र, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर सामाजिक विज्ञान शिक्षण के निम्न उद्देश्य बताता है –

प्राथमिक स्तर पर -
(i) बालक में अवलोकन, परख और वर्गीकरण कौशलों का विकास करना l
(ii) सामाजिक पर्यावरण के पारस्परिक संबंधों पर जोर देते हुए बालक में पर्यावरण के प्रति समग्रतात्मक विकास करना l
(iii) भिन्नता और विविधता के प्रति सम्मान की भावना का विकास एवं बालक को सामाजिक मुद्दों के प्रति सुग्राही बनाना l

उच्च प्राथमिक स्तर पर –
(i) मानव जीवन और अन्य प्राणियों के बसेरे के रूप में पृथ्वी के बारे में समझ विकसित करना l
(ii) अपने क्षेत्र, प्रदेश और देश को वैश्विक सन्दर्भ में अध्ययन करने का विद्यार्थी में सूत्रपात करना l
(iii) विश्व के अन्य भागों के परिप्रेक्ष्य में भारत के अतीत के अध्ययन का विद्यार्थी में सूत्रपात करना l
(iv) विद्यार्थियों को देश की सामाजिक और राजनैतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं की क्रियाशीलता और गतिशीलता से परिचित करवाना l

इन्हीं शिक्षण उद्देश्यों के आधार पर हम अपने विद्यार्थियों के लिए सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का उपयोग करते हैं, जिसके लिए हम आकलन हेतु सूचकों की विस्तृत सूचि तैयार करते हैं l प्रत्येक सूचक में उन योग्यताओं का समावेश करते हैं जिनका बालकों में विकास किया जाना है l इसे निम्न तालिका से समझा जा सकता है –
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क्रम सं०
सूचक
योग्यताएँ
1
अवलोकन और पठन
रिपोर्टिंग, कथन और चित्रण, चित्र पठन, चित्र निर्माण, सरणी और मानचित्र
2
चर्चा
सुनना, बातें करना, विचार व्यक्त करना आदि
3
अभिव्यक्ति
चित्रण, शरीरिक क्रियाएँ, तर्क, लेखन, मूर्तिकारी तार्किकता
4
वर्गीकरण
श्रेणी विभाजन, समूह निर्माण, अंतर और तुलना करना
5
प्रश्न पूछना
जिज्ञासा प्रकट करना, प्रश्नों का विकास, समीक्षात्मक चिंतन
6
विश्लेषण
अनुमान करना, परिकल्पना, और निष्कर्ष निर्माण
7
प्रयोग
तत्काल निर्माण करना, वस्तुएँ बनाना और प्रयोग करना
8
न्याय और समानता
गैर-लाभप्रद या भिन्न योग्यता वालों के प्रति संवेदनशीलता, पर्यावरण के प्रति लगाव
9
सहयोग
सूत्रपात करना, जिम्मेदारी लेना, साझा करना और साथ-साथ मिलकर कार्य करना
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बालकों में ऊपर वर्णित योग्यताओं के विकास के लिए उपरोक्त सूचकों के आधार पर हम शिक्षार्थियों का सतत एवं व्यापक मूल्यांकन करते हैं l उदहारण के लिए हम आकलन हेतु सृजनात्मक लेखन, अभिनय और नृत्य का व्यापक इस्तेमाल करते हैं l क्योंकि जब हम बालकों को इन विधियों से सृजनात्मक अभिव्यक्ति का अवसर देते हैं तो वे बेहतर ढंग से अधिगम करते हैं l

इसके अतिरिक्त सतत एवं व्यापक मूल्यांकन हेतु हम कक्षा में चित्रकारी करवाते हैं l इससे यह परिणाम निकलता है कि बालक स्वयं को चित्रकारी के माध्यम से अधिक स्वतंत्रतापूर्वक और गहराई से अपने आप को अभिव्यक्त करते हैं l इसके साथ ही चित्र पठन कार्य भी सतत एवं व्यापक मूल्यांकन में सहायक होता है l

हम बालकों के सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के लिए पोर्टफोलियो का भी इस्तेमाल करते हैं l इस पोर्टफोलियो में विद्यार्थियों का सम्पूर्ण विद्यालयी वर्ष का प्रगति और विकास का रिकॉर्ड रखते हैं l पोर्टफोलियो विद्यार्थी द्वारा किये गए वास्तविक कार्य का रिकॉर्ड होता है जो हमें यह समझने में मदद करता है कि बालक कितना निपुण है l साथ ही साथ समय-समय पर सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में क्षेत्र भ्रमण और प्रयोगात्मक परीक्षण के जरिये भी हम अपने विद्यालय में विद्यार्थियों का सतत एवं व्यापक मूल्यांकन करते हैं l

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