ASSIGNMENT-1 ANSWER-1 OF COURSE 501- NIOS D.EL.ED. EXAM

Chandan 6:20 pm

Q. बदलते वर्तमान समाज एवं शिक्षार्थी....

ASSIGNMENT-1 ANSWER-1 OF COURSE 501- NIOS D.EL.ED. EXAM

ANS. भारत की सांस्कृतिक परंपरा इतनी समृद्ध रही है कि बहुत सी कमियों के बावजूद , यह सामाजिक पुनर्निर्माण तथा विकास का एक सशक्त साधन रहा है l अतः बदलते वर्तमान समाज एवं शिक्षार्थी की आवश्यकताओं की व्याख्या करने से पूर्व प्राचीन भारतीय समाज तथा वर्तमान भारतीय समाज की शैक्षिक पद्धतिओं की समीक्षा करना न्यायोचित होगा l क्योंकि, इसी सन्दर्भ में हम यह भी समझ सकेंगे कि आज का भारतीय समाज किस हद तक परिवर्तित हुआ है और इन बदलते हुए परिस्थितियों में शिक्षार्थियों में किन नई चीजों की आवश्यकताएँ उत्पन्न हुई है l

प्राचीन भारतीय समाज एवं वर्तमान भारतीय समाज की शैक्षिक प्रणाली  

प्राचीन भारतीय समाज में शिक्षा के रुपरेखा का जो जिक्र मिलता है उसमें हम देखते हैं कि उस समय शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली प्रचलित थी , जहाँ एक निश्चित अध्ययन अवधि के लिए विद्यार्थियों को गुरु के साथ घर से दूर रहना पड़ता था l लेकिन, आज के समाज में हम देखते हैं कि विद्यार्थियों के लिए उनके घर के आस-पास ही विद्यालय स्थापित किये जाते हैं l आज के वर्तमान समाज में शिक्षा के सार्विकीकरण की जो बात होती है उसके लिए यह जरुरी भी है कि विद्यालय शिक्षार्थियों के पहुँच में हों l

प्राचीन भारतीय समाज एवं वर्तमान भारतीय समाज के शिक्षा के उद्धेश्य में भी बहुत बड़ा अंतर है l उस समय विद्यार्जन का मुख्य उद्देश्य आत्मानुभूति तथा अंततः मोक्ष प्राप्ति ही था , लेकिन आज हमारा जीवन दर्शन भी आदर्शवाद से प्रयोजनवाद की ओर परिवर्तित हो गया है l इतना ही नहीं , आज के वर्तमान समाज तथा वैश्विक समाज में ऐसे विस्मयकारी परिवर्तन हो रहे हैं जिसके कारण एक नई व्यवस्था उभर कर सामने आ रही है l आई० सी० टी० (Information and Communication Technology) के कारण जीवन के साथ ही शिक्षा में एक क्रांति आ गयी है जिसके कारण नए शैक्षिक क्षेत्रो का विकास हुआ है , नई सेवाओं का ईजाद हुआ है, नए सन्दर्भ विकसित हो गए हैं, तथा नई समस्याएं तथा उनके नए समाधान उभर कर सामने आये हैं l

आज के शिक्षक को उन मुद्दों से जो नई अधिगम प्रक्रिया तथा नवीन अधिगम पर्यावरण से जुड़ें हैं , सम्बद्ध होना होगा l उन्हें यह मालूम करना होगा कि अधिगम का सरलीकरण कैसे किया जा सकता है तथा परिवर्तन दर को कैसे त्वरित किया जा सकता है l अतः इन नई आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एक शिक्षक होने के नाते मैं स्वयं में निम्नलिखित बदलाव करना चाहूँगा ताकि शिक्षार्थी की जरुरत को पूरा किया जा सके l

1. आई० सी० टी० का पोषक तथा विकासक

आई० सी० टी० की महता को देखते हुए सबसे पहले तो मैं स्वयं ही इससे पूर्ण रूप से परिचित होना चाहूँगा l राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रुपरेखा 2005 भी ICT के उपयोग की वकालत करता है l विद्यालयों में भी ICT का उपयोग हो रहा है या होगा , तो ऐसे में मुझे भी ICT का विकासक तथा ई-कल्चर का पोषक होना होगा l क्योंकि, जब सारा विश्व तेज गति से ICT के साथ आगे बढ़ रहा है तब यदि हम परम्परागत रूप से तथा असम्बद्ध रूप से या वियोजित रूप से बच्चों को पढ़ाएंगे तो निश्चित रूप से हम हमारे समाज को पिछड़ेपन से नहीं उबार सकते l

2. एक अच्छा सुगमकर्ता (Facilitator) बनना



ऐसा माना जाता है कि बच्चे अपनी गति से सीखते हैं l अगर हम उनकी सीखने की गति को बढ़ाना चाहते हैं तो निश्चित ही facilitator की अपनी भूमिका का निर्वाह करना पड़ेगा l एक छोटा बच्चा जब प्रथम बार विद्यालय आता है तो वह अपने साथ अपना ज्ञान, अपना अनुभव साथ लेकर आता है l ऐसे में हमें उनके अनुभव को शामिल करते हुए उसके सामने ऐसे अधिगम क्षेत्र उत्पन्न करने होते हैं तथा एक सुगमकर्ता के रूप में उनके सामने ऐसे उदहारण रखने पड़ते हैं कि वे आसानी से सीख सकें l इसलिए मैं एक अच्छा सुगमकर्ता (Facilitator) बनना चाहता हूँ l 


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