502- NIOS D.EL.ED. ASSIGNMENT 3 - सत्रीय कार्य - lll - 1000 शब्दों में यूनिक उत्तर

Q. मान लीजिये कि ऐसे विद्यालय में कार्यरत हैं जिसमें ज्यादातर बच्चे किसी विशिष्ट....

502- NIOS D.EL.ED. ASSIGNMENT 3 - सत्रीय कार्य - lll - 1000 शब्दों में यूनिक उत्तर 

ANS. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से जनजातीय व्यक्तियों को मुख्य धारा से जोड़ने हेतु उनके समग्र विकास हेतु कई प्रयास किये गए हैं l परन्तु आज भी जनजातीय लोगों की समस्या विचारणीय बनी हुई है l भारत की जनगणना 2001 के अनुसार जनजाति की साक्षरता दर बहुत कम है और जनजातीय बालिकाओं के सन्दर्भ में यह अत्यंत शोचनीय है l विद्यालयों में जनजातीय बच्चों का नामांकन अन्य समूहों की तुलना में कम है l आधे से अधिक संख्या में जनजातीय बच्चे प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने से पूर्व ही विद्यालय छोड़ देते हैं l साधारणतया विद्यालय की भाषा जनजातीय बच्चे के घर की भाषा से बिलकुल भिन्न होती है l इस कारण वे कक्षा-शिक्षण एवं पाठ्यपुस्तकों की भाषा को समझने में कठिनाई का सामना करते हैं l परिणामस्वरूप वे पढने तथा सुनने में निम्न स्तर का प्रदर्शन करते हैं तथा दूसरों के साथ संप्रेषण की योग्यता का विकास भी उनमें ठीक तरह से नहीं होता है l



चूँकि मातृभाषा द्वारा अवधारणाओं को उत्तम रूप से समझा जाता है इसलिए बच्चे जो भाषा बोलते हैं और ठीक से समझते हैं, उसके द्वारा शिक्षण होने से वह बेहतर सीखते हैं l लेकिन जब कक्षा में जनजातीय बच्चों को किसी अन्य भाषा में पढाया जाता है तो बच्चे रुचिहीन प्रतीत होते हैं और शिक्षक जो कुछ भी पढ़ा रहा होता है वह उसके समझ से बिल्कुल परे होता है l वे शिक्षक को लगातार देखते रहते हैं और कभी-कभी ब्लैक बोर्ड पर लिखे शब्दों और अक्षरों को भी l इस स्थिति में शिक्षण बच्चों के लिए एक बोझ बन जाता है और जो बच्चे इस बोझ को सहन नहीं कर पाते विद्यालय छोड़ देते हैं l अतः इस प्रकार के जनजातीय बच्चों को सिखाने हेतु कई प्रकार की गतिविधियाँ की जा सकती हैं जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा दर्शाया गया हैं l
1. बच्चों की मातृभाषा सीखना – हालाँकि प्रत्येक बच्चे की मातृभाषा को सीखना संभव नहीं है फिर भी यदि शिक्षक बच्चों की मातृभाषा का ज्ञाता अगर हो जाता है तो उसका काफी हद तक काम आसान हो जाता है l अतः मैं समर्पित भाव से बच्चों की मातृभाषा उनके तथा समुदाय के लोगों से अंतः क्रिया कर सीख सकता हूँ l
2. मातृभाषा को शिक्षण के माध्यम के रूप में प्रयोग करना – जैसा कि मैंने ऊपर बताया है कि बच्चों को अगर उनके परिचित भाषा में पढाया जाए तो वो उसे आसानी से समझ पाता है l जैसे कि कक्षा 1 की संथाली ‘आलाह’ समझ सकती है परन्तु ‘घर’ नहीं , ‘मिरोम’ परन्तु ‘बकरी’ नहीं,  ‘डाका’ परन्तु ‘चावल’ नहीं l वह ‘घर’ के बारे में अपनी मातृभाषा में 5-10 वाक्य भी बोल सकती है परन्तु अन्य भाषा जो उनके लिए विदेशी हैं , हो सकता है कि उसमें वह एक शब्द भी न बोल पाए l इसलिए मातृभाषा का उपयोग शिक्षण – अधिगम के रूप में करने से बच्चे को अवधारणा समझने में आसानी होती है , बल्कि इससे उसमें आत्मविश्वास भी उत्पन्न होता है l अतः मैं हमेशा उनकी मातृभाषा में ही शिक्षण करने का प्रयास करूँगा l 
3. अधिगम – शिक्षण प्रक्रिया में स्थानीय ज्ञान का समावेश – मैं अपने शिक्षण –अधिगम प्रक्रिया में स्थानीय एव क्षेत्रीय ज्ञान को समाहित करना चाहूँगा क्योंकि ऐसा करने से उन्हें पाठ्यचर्या को समझने में सहूलियत होगा l उदहारण के लिए , अगर मुझे गणित विषय में मापन की प्रक्रिया को समझाना है तो सबसे पहले मुझे स्थानीय मापन के शब्द जैसे – सेर, मन आदि के शब्दों को बताना पड़ेगा तब जाकर वह गणित के उक्त प्रक्रिया को स्वयं से जोड़कर समझ पायेगा l
4. कक्षा अधिगम में लोक सामग्री का उपयोग – प्रत्येक समुदाय में उनकी अपनी लोक कथाएं , गीत , पहेलियाँ , कला तथा पेंटिंग्स आदि होती हैं l शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में इन चीजों को शामिल कर मैं अध्ययन सामग्री को तो सरल बना ही सकता हूँ साथ ही यह आनंदायक भी होगा और अधिगम प्रतिफल की प्राप्ति भी सहज हो जायेगा l
5. सामाजिक-सांस्कृतिक ज्ञान वाली पाठ्यपुस्तकों को अपनाना – पाठ्य-पुस्तकों को अपनाने का अर्थ है कि सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को पाठ्यपुस्तक की विषय वस्तु में रखना तथा जहाँ आवश्यक हो वैकल्पिक विषय वस्तु तैयार करना ताकि बच्चों का अधिगम अनुभव आधारित हो जाए l
6. समुदाय से सांस्कृतिक ज्ञान प्राप्त करना – एक शिक्षक होने के नाते मुझे बच्चों के समुदाय का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है l इसके लिए मुझे उनके समुदाय में घुलना मिलना होगा और उनके लोगों से बात करनी होगी , उनसे सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर चर्चा करनी होगी तथा उनके पर्व-त्योहारों में शामिल होना होगा l इन सब के लिए मुझे खुद में बदलाव लाकर सीखने की ललक पैदा करनी होगी l
7. विद्यालय क्रियाकलाप में समुदाय को शामिल करना – मैं अपने शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में समुदाय को शामिल कर रोचक बनाना चाहूँगा l जैसे कि समुदाय के सदस्य बच्चों को स्थानीय कला, क्राफ्ट , गीत, संगीत, कहानी और अन्य अच्छी प्रथाएं सिखाने में हमारी मदद कर सकते हैं l विद्यालय प्रबंध तथा कक्षा कक्ष की गतिविधियों में समुदाय को शामिल करने से बच्चों की निष्पति में सकारात्मक परिवर्तन आता है l अतः मैं समुदाय के संसाधनों का भरपूर उपयोग करना चाहूँगा l
8. बहुभाषी शब्दकोष – इस कड़ी में मैं अपने कक्षा के बच्चों के मातृभाषा के शब्दों को लेकर एक बहुभाषी शब्द्कोष बना सकता हूँ l यह प्रक्रिया न सिर्फ बच्चों के शब्द ज्ञान को बढ़ाएगा बल्कि उन्हें अन्य भाषा को तेजी से सीखने में भी मदद करेगा और उनमें समझने सीखने की शक्ति को बढ़ाएगा l
9. शब्द पहचान कार्ड- यह एक बेहतर सामग्री है उन सभी शिक्षकों के लिए जो जनजातीय भाषा को नहीं जानते हैं l इस प्रक्रिया में बच्चों की सहायता से अक्षरों का उनकी मातृभाषा में एक सचित्र कार्ड बना कर दिखाया जा सकता है और बाद में उसे उसी अक्षर से अन्य भाषा के अक्षर को बताया जा सकता है l
10. पूर्ण शारीरिक प्रत्युतर – जनजातीय बच्चे भले ही हमारी भाषा को न समझे लेकिन शारीरिक हरकत को पहचान कर वे उसे जरुर समझ सकते है जैसे कि अगर उनसे कहा जाए बैठ जाओ, खड़े हो जाओ, अपना माथा छुओ, घूम जाओ, अपना पेन पकड़ो, अपनी नाक छुओ, आदि साथ ही शारीरिक गतिविधि भी दिखाया जाए तो वह बिना कोई भाषा जाने उन गतिविधियों को आसानी से फोलो कर सकता है l ये पूर्ण शारीरिक प्रत्युतर (TPR- Total Physical Response) कहलाता है l यह एक प्रकार की ‘सुनो और करो’ क्रियाकलाप है l इस TPR प्रक्रिया से शुरुआती कक्षाओं में बच्चों में द्विभाषा का विकास किया जा सकता है l इस प्रक्रिया में बच्चे शिक्षक की क्रिया तथा मौखिक आदेश साथ-साथ देखते व सुनते हैं और उसका प्रत्युतर स्वरुप उन क्रियाओं को करते हैं l इन क्रियाओं को करते हुए बच्चे धीरे-धीरे द्वितीय भाषा में उनका अर्थ अर्जित कर लेते हैं l इस प्रकार मातृभाषा रहित शिक्षक भी जनजातीय बच्चों को अच्छे से शिक्षण प्रदान कर सकते हैं l

अतः बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम, समुदाय की भाषा, सांस्कृतिक सन्दर्भों का प्रयोग, लोक कलाओं की सामग्री का उपयोग, TPR आदि ऐसे कई नवाचार के प्रयोग से मैं जनजतीय बच्चों के मातृभाषा को न जानते हुए भी उन्हें बहुत कुछ सीखा व पढ़ा सकता हूँ l 



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