स्वामी विवेकानंद जयंती पर विशेष - Swami Vivekananda's Thoughts of Hindu Dharma

Chandan 8:27 pm
Swami Vivekanand and Hindu dharma
Swami Vivekananda's Thoughts of Hindu Dharma-आज स्वामी विवेकानंद का जयंती पुरे भारत में धूम-धाम से मनाया जा रहा है l आज भारत में उन्ही के जयंती पर युवा दिवस भी मनाया जाता है l स्वामी विवेकानंद एक महान ऋषि के साथ -साथ महान विचारक भी थे जिनके विचारों का पूरी दुनिया लोहा मानती है l

आज हम अपने ब्लॉग पाठकों को उनके अनेकों महान विचारों में से एक विचार जो हिन्दू धर्म के बारे में स्वामी जी के द्वारा बताई गयी है , यहाँ पेश कर रहे हैं जो निश्चित रूप से आप पसंद करेंगे l

Swami Vivekananda's Thoughts of Hindu Dharma




हिन्दू जाति ने अपना धर्म आप्तवाक्य वेदों से प्राप्त किया है l उनकी धारणा है कि वेद अनादि और अनंत है l श्रोताओं को , सम्भव है , यह हास्यास्पद मालूम हो और वे सोचे कि कोई पुस्तक अनादि और अनंत कैसे हो सकती है , किन्तु वेद का अभिप्राय किसी पुस्तक विशेष से नहीं है l वेद का अर्थ है भिन्न -भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक तत्वों का संचित कोष l जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत मनुष्यों के पता लगने के पूर्व से ही अपना काम करता चला आया था और आज यदि मनुष्य जाति उसे भूल भी जाये तो भी वह नियम अपना काम करता ही रहेगा , ठीक वही बात आध्यात्मिक जगत को चलाने वाले नियमों के सम्बन्ध में भी है l जो नैतिक तथा आध्यात्मिक पवित्र सम्बन्ध एक आत्मा का दूसरी आत्मा के साथ और प्रत्येक आत्मा का परम पिता परमात्मा के साथ हमारे पता लगाने के पूर्व थे , वे ही सम्बन्ध , हम चाहे उन्हें भूल भी जाये तो भी बने रहेंगे l
इन सत्य समूहों का अविष्कार करने वाले ऋषि कहलाते हैं , और हम उनको पूर्णत्व को पहुँचीं हुई विभूति जानकर सम्मान देते हैं l मुझे यह बतलाते हुए अत्यंत हर्ष होता है कि इनमें से कई तो अत्यंत उच्च-पद प्राप्त स्त्रियाँ भी थी l

ऐतिहासिक युग के पूर्व के केवल तीन ही धर्म आज संसार में प्रचलित है - हिन्दू धर्म , पारसी धर्म और यहूदी धर्म l ये तीनो धर्म अनेकानेक प्रचण्ड आघातों के पश्चात् भी लुप्त न होकर आज भी जीवित है - यह उनकी आतंरिक शक्ति का प्रमाण है l पर जहाँ हम यह देखते हैं कि यहूदी धर्म ईसाई धर्म को नहीं पचा सका वरन अपने सर्व-विजयी संतान ईसाई धर्म द्वारा अपने जन्म-स्थान से निर्वासित कर दिया गया , और केवल मुट्टी भार पारसी ही अपने महान धर्म की गाथा गाने के लिए अब अवशेष है ,- वहाँ भारत में एक के बाद एक अनेकों धर्म पंथों का उद्भव हुआ और वे पंथ वेद्प्रणित धर्म को जड़ से हिलाते से प्रतीत हुए , पर भयंकर भूकंप के समय समुद्री किनारे की जलतरंगों के समान यह धर्म कुछ समय के लिए पीछे इसीलिए हट गया कि वह तत्पश्चात हजार गुना अधिक बलशाली होकर सम्मुखस्थ सब को डुबाने वाली बाढ़ के रूप में लौट आये और जब इन आगंतुकों के विप्लवों का कोलाहल शांत हो गया , तब ये सभी धर्म संप्रदाय अपनी जन्म-दात्री मूल हिन्दू धर्म की विराट काया द्वारा मानो शोषित होकर पचा लिए गए- उसी में समाविष्ट हो गए l

Note:- 1893 ई० में स्वामी विवेकानंद के द्वारा यह विचार शिकागो धर्म परिषद् में पढ़ा गया था l
साभार- श्री रामकृष्ण आश्रम , नागपुर , मध्य प्रदेश l

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