मूर्ख ब्राह्मण - A Short Story in Hindi With Moral - Murkh Brahman

चम्पक नगर में केशव नाम का एक ब्राह्मण रहता था l वह इतना मूर्ख था कि विद्या किसे कहते हैं ? यह भी नहीं जानता था l इतना ही नहीं उसे शुद्ध बोलना भी नहीं आता था l

वह ब्राह्मण एक दिन घूमता-घूमता धारानगरी में जहाँ कालिदास रहते थे , आ पहुंचा l उसने कालिदास से मिलकर कहा – पंडित जी ! मैं बहुत गरीब हूँ , मेरा दुःख दूर करने वाला कोई नहीं है l मेरे ऊपर कृपा करके यदि महाराज से कुछ द्रव्य दिलवा दे तो मेरी गरीबी दूर होगी l

कालिदास को समझ में आ गया कि यह शुद्ध बोल भी नहीं पा रहा है l यह सोच कर उनको दया आ गयी l कालिदास उस ब्राह्मण को अपने पास रखा और उसको 27 नक्षत्रों के नाम सिखाने का प्रयास किया l

एक महीने बाद जब उसे सब नक्षत्रों के नाम याद हो गए, तब कालिदास ने विचार किया कि , आज इस ब्राह्मण को राजा भोज के पास ले जाकर कुछ द्रव्य दिलवाऊं l उन्होंने ब्राह्मण को अपने पास बुलाकर कहा – “आज तुमको महाराज की ओर से बुलवाऊंगा l तुम समय से दरबार में पहुँच जाना और जिस समय दूसरा कोई न बोलता हो , तब तुम याद किये हुए 27 नक्षत्रों के नाम बोलना और कुछ भी न बोलना l”

उसको यह अच्छी तरह समझाकर कालिदास राजसभा में गए , वहाँ उन्होंने राजा से कहा – “महाराज ! मेरे घर पर एक विद्वान ब्राह्मण आया है , मैंने उसको दो दिन से रखा है l” यह सुनकर राजा भोज ने कहा – “उनको हमारी सभा में बुलाईये l”

राजा के आज्ञानुसार सेवक एक पालकी लेकर विद्वान पंडित को बुलाने गया l कुछ देर बाद वह केशव ब्राह्मण कालिदास के समझाए अनुसार साधारण कपड़े पहन कर पालकी में बैठ राजसभा में आया l उसने राजसभा की भव्यता को सपने में भी नहीं देखी थी l वह महल की खूबसूरती देखकर आश्चर्यचकित रह गया और अपने सीखे हुए ज्ञान को भी भूल गया l 27 नक्षत्रों के नामों में से उसको केवल उस समय चार ही याद आये और वह जल्दी से बोल गया –
          ‘अश्विनी , पुनर्वसु , रेवती , कृतिका’ l

यह सुनकर राजा कालिदास की ओर देखकर आश्चर्य से बोले – “पंडितराज ! आप तो इस ब्राह्मण की ह्रदय से प्रशंसा करते थे परन्तु यह तो महामूर्ख मालूम पड़ता है , इसका क्या कारण है ?”

कालिदास ने उत्तर दिया कि महाराज ! इस विद्वान पुरुष ने इन चार नक्षत्रों के नाम कहकर आपको आशीर्वाद दिया है , इसका अर्थ आपको समझ में नहीं आया है ? वो इस प्रकार है – अश्विनी अर्थात् घोड़ी आपकी महल में हमेशा हो , पुनर्वसु अर्थात् लक्ष्मी भी आपके भवन में निरंतर रहे , रेवतीपति अर्थात् बलदेव के छोटे भाई श्रीकृष्ण उनकी सेवा से, कृतिका का पुत्र जो कार्तिक स्वामी है उनके सदृश आपका पराक्रम हो l

इस प्रकार कालिदास की बातों को सुनकर राजा प्रसन्न हुए और मूर्ख केशव ब्राह्मण को एक हजार सोने की मोहरें देकर विदा किया l वह गरीब ब्राह्मण विद्वान कालिदास का उपकार मानते हुए अपने नगर को लौट गए और वहाँ सुखपूर्वक रहने लगा l

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अनमोल वचन :- “स्मरण ही काफी नहीं है , अनुसरण भी चाहिए l बुद्धि और भावना का समन्वय ही विवेक है l”

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