कृतघ्नता - A Short Story in Hindi

एक बार जंगल में तालाब के किनारे एक हिरन पानी पी रहा था , तभी उसे शिकारी की आहट सुनाई दी और वह भागा l शिकारी उसके पीछे-पीछे आ रहा था l दौड़ता हुआ हिरन अचानक रुका और एक घने पौधे के पीछे छिप गया और शिकारी की नजर न पड़ी , वह उसे खोजता हुआ आगे निकल गया l 

हिरन की जान बच गई , उसने राहत की साँस ली l तभी हरे – भरे पौधे की पत्तियों को देखकर हिरन को भूख महसूस हुई और उसने पत्तियों को खाना शुरू कर दिया l थोड़ी ही देर में उसने घने पौधे की काफी पत्तियां खा चुका था l इसलिये उसका शरीर पत्तों के पीछे छिपना संभव नहीं था l तभी परेशान शिकारी हिरन को ढूंढते हुए वापस आ रहा था कि उसकी नजर हिरन पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष पर तीर चढ़ाकर हिरन को घायल कर दिया l हिरन की मृत्यु निकट थी , हिरन ने मन में सोचा कि काश ! जिस पत्तों ने मुझे आश्रय देकर बचाया , उसके प्रति मैं कृतज्ञ होता तो मैं बच जाता l इसलिए जो आश्रय देने वाले के साथ कृतघ्नता करता है उसका हश्र मेरे जैसा ही होता है l 

याद रखिये – अपनी संतान में कृतज्ञता की भावना का विकास करने के लिए आपको स्वयं कृतज्ञ बनना पड़ेगा l बच्चों के बड़े कान होते हैं वे हमारी हर बात को ध्यान से सुनते हैं l बच्चों की उपस्थिति में कभी किसी के उपकार अथवा दया की उपेक्षा न कीजये l कोई उपहार मिलने पर कभी यह न कहिये – “देखो न उसने उपहार स्वरुप यह कैसा रद्दी कपडा भेजा है , उसने स्वयं इसे बुना है l एक पैसा भी तो उसे खर्च नहीं करना पड़ा l” बल्कि यों कहिये – ”देखो मेरे दोस्त ने इसे बनाने में कितना समय लगाया होगा ! कितना अच्छा है यह ! है न ? आज ही हमें उसे फ़ोन से धन्यवाद कहना चाहिए l” हमारे ऐसे व्यवहार को देखकर बच्चे सहज ही में प्रशंसा करने तथा धन्यवाद देने की आदत सीख लेंगे l 

अनमोल वचन – “प्रसन्नता तो चन्दन है , दूसरों के मस्तिष्क पर लगाइये , आपकी उँगलियाँ स्वयं महक उठेगी l”

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