अपना घर - A Moral Short Story in Hindi-Apna Ghar

एक सुखी गृहस्थ परिवार था l फिर भी उस गृहस्थ व्यक्ति को और सर्वोतम सौन्दर्य की तलाश थी l इसी कारण वह बिना घर में बताये निकल पड़ा l चलते-चलते वह एक संन्यासी के पास पहुंचा और अपनी जिज्ञासा प्रकट की l संन्यासी ने उसे बताया – श्रद्धा l क्योंकि श्रद्धा ही एक मिट्टी के ढेर को भगवान का रूप बना सकती है l गृहस्थ को इस उत्तर से संतोष नहीं हुआ l फिर वह आगे बढ़ा l रास्ते में एक सज्जन गुणवान व्यक्ति मिले l उनसे भी अपनी जिज्ञासा बताई तो उन्होंने कहा – प्रेम इस जगत का सबसे सुन्दर गुण है l यही संसार को सुन्दर बनाता है l इस प्रेम के कारण ही काले श्रीकृष्ण भी गोपियों को प्रिय लगते थे l गृहस्थ को कुछ समझ में आया l फिर भी वह प्रेम के बारे में सोच विचार करते हुए आगे बढ़ा l

कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसे युद्ध भूमि से लौटते हुए कंधे पर हथियार लिए हुए एक सैनिक मिला l उस गृहस्थ ने उस सैनिक से बात की और अपनी जिज्ञासा में उससे पूछा कि इस पृथ्वी पर सबसे सर्वोत्तम क्या हो सकता है ?

प्रश्न सुनकर सैनिक ने उत्तर दिया – ‘शान्ति’ ! उसने बताया कि भीषण संघर्ष और विनाश की लीला मैंने अपनी आँखों से देखा है l इस संसार में शान्ति से बढ़कर सुन्दर कुछ भी नही है l गृहस्थ को समझ में आया लेकिन संतुष्ट न हो सका , क्योंकि जितने मुंह उतनी बातें सुनी l निराश होकर वह अपने घर वापस आने की ओर कदम बढ़ा दिया l

दो दिन की प्रतीक्षा के बाद घर में सभी व्याकुल हो रहे थे l घर पहुंचा तो बच्चे उससे लिपट कर रो पड़े l पत्नी सामने भाव-विह्वल-सी खड़ी थी , पुत्र अपने पिता की खोज में दौड़-दौड़ कर थक कर निस्तेज हो चुका था l बेटी की आँखें रो-रो कर लाल हो चुकी थी l उसके पहुँचते ही घर में आत्मीयता का , स्नेह का , गहन श्रद्धा का सागर उमड़ पड़ा l सभी बहुत खुश हुए l यह देखकर गृहस्थ को असाधारण शान्ति का अनुभव हुआ l उसने देखा कि तीनों गुणों का समन्वय तो अपने घर-परिवार में ही है l उसके मुँह से निकल पड़ा , मैं कहाँ भटक रहा था – श्रद्धा , प्रेम और शान्ति , इन तीनों के दर्शन अपने घर में नहीं कर पा रहा था !

अनमोल वचन – जब किसी चीज के गुणों का पता नहीं चलता तो उसकी बुराई होने लगती है l जैसे – भिलनी , हाथी की कीमत नहीं जानती , फिर उसकी बुराई करके मन शांत कर लेती है l लोमड़ी जब अंगूरों तक पहुँच नहीं सकती , तो कह देती है कि अंगूर खट्टे हैं , मैं तो मीठे अंगूर ही खाती हूँ l

याद रखिये – एक आदर्श संन्यासी होने की अपेक्षा एक आदर्श गृहस्थ होना अधिक कठिन है l 

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