Swami Vivekananda Hindi Speech and Thoughts about Hindu Dharma

Chandan 9:18 pm
श्री स्वामी विवेकानंद ( Swami Vivekananda) का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था l श्री स्वामी के जन्मदिवस पर आज मैं उनके द्वारा हिन्दू धर्म पर दिए गए भाषण post कर रहा हूँ l उनके इस speech में हिन्दू धर्मं का सूक्ष्म विश्लेषण है जिससे इस महान प्राचीन धर्म की पूर्ण जानकारी हमें प्राप्त हो जाती है l जो हिन्दू - धर्म - प्रेमी हैं और जो इस धर्म के मूलभूत सिद्धांतों को जानना चाहते हैं उनके लिए यह post बहुत ही लाभकारी सिद्ध होगा l

Swami Vivekananda hindi speech and thoughts about hindu dharma
shri swami



मानव जाति के अधिक से अधिक अंश को संतुष्ट करने के लिए धर्म का स्वरुप ऐसा होना चाहिए कि वह इन विभिन्न प्रकार के मनों को खाद्य सामग्री प्रदान कर सकें ; और वे सभी वर्तमान पंथ , जिनमें ऐसी योग्यता का अभाव है एकदेशीय हो जाते हैं l मान लीजिए कि आप एक ऐसे पंथ वाले के पास गए जिसमें प्रेम और भाव का उपदेश दिया जाता है l वे गाते हैं , रोते हैं और प्रेम का उपदेश देते हैं l पर ज्योंहि आप कहते हैं , "मित्रवर , यह सब तो ठीक है , पर मुझे तो इससे कोई अधिक प्रबल वस्तु चाहिए ; कुछ थोड़ा तर्क और तत्वज्ञान हो ; मैं सब बातों को क्रमशः और कुछ युक्तिपूर्वक समझना चाहता हूँ " तो वे कहते हैं - "चलो जाओ l" और वे आपको चले जाने के लिए ही नहीं कहेंगे , पर यदि उनके वश की बात हो , वे आपको दूसरी जगह भेज देंगे l परिणाम यही होता है कि वे पंथवाले केवल भावनाप्रधान वाले लोगों को सहायता दे सकते हैं और इतना ही नहीं कि वे अन्य लोगों को सहायता नहीं देते , वरन उनको नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं l सबसे बढ़कर दुष्टता तो यह है कि वे दूसरों को सहायता तो देंगे ही नहीं , पर उनकी आन्तरिकता में भी विश्वास नहीं करेंगे l पुनः ऐसे तत्वज्ञानी भी हैं जो भारत का और पूर्वीय देशों के ज्ञान का बखान करेंगे और बड़े - बड़े पचास अक्षरों के दार्शनिक शब्दों का उपयोग करेंगे , पर जब उनके पास मुझ जैसा साधारण मनुष्य जाकर पूछेगा , "क्या आप मुझे आध्यात्मिक बनाने की कोई बात बता सकते हैं ?" तब सबसे पहले तो मुस्कुरा कर यह कहेंगे , "तुम हमसे बुद्धि में बहुत कम हो , तुम आध्यात्मिक के विषय में क्या समझोगे ?" ये लोग बहुत 'ऊँचे' तत्वज्ञानी है ! ये आपको केवल दरवाजा दिखाते हैं l पुनः कई योग-पंथ हैं जो जीवन के कई स्तरों (Planes), मन की कई अवस्थाओं के सम्बन्ध में , मानसिक शक्ति द्वारा क्या-क्या किया जा सकता है आदि - आदि बहुतेरी बातें बताते हैं और यदि आप साधारण मनुष्य है और उनसे पूछते हैं - "कोई अच्छा काम बताइये जिसे मैं कर सकूँ l मैं बहुत पूर्वापर सोचना नहीं जानता l कोई ऐसी वस्तु दे सकते हैं , जिसके मैं लायक हूँ ?" वे हँसकर कहेंगे , "सुनो इस मूर्ख की बात ; जानता यह कुछ नहीं ; इसका जीवन व्यर्थ है l" और यही बात संसार में सर्वत्र प्रचलित है l मेरे मन में तो यही आता है कि इन सभी विभिन्न पंथों के कट्टर उपदेशकों को एकत्र करके एक कोठरी में बंद कर दूँ और उनकी सुन्दर तिरस्कारयुक्त हँसी का छायाचित्र उतार लूँ !  

धर्म की वर्तमान अवस्था , प्रत्यक्ष वस्तुस्थिति ऐसी ही है l मैं जिसका प्रचार करना चाहता हूँ , वह ऐसा धर्म है , जिसे सभी प्रकार के मन एक समान ग्रहण कर सकें l वह दार्शनिक हो , उतना ही भावात्मक हो , बराबर यौगिक हो और उतना ही कर्म की ओर प्रेरणा करने वाला हो l

ऐतिहासिक युग के केवल तीन ही धर्म आज संसार में प्रचलित है – हिन्दू धर्म , पारसी धर्म और यहूदी धर्म l ये तीनों धर्म अनेकानेक प्रचंड आघातों के पश्चात भी लुप्त न होकर आज भी जीवित है l यह उनकी आतंरिक शक्ति का प्रमाण है l पर जहाँ हम यह देखते हैं कि यहूदी धर्म ईसाई धर्म को नहीं पचा सका वरन अपने सर्व-विजयी संतान , ईसाई धर्म द्वारा अपने जन्मस्थान से निर्वासित कर दिया गया , और केवल मुट्टी भर पारसी ही अपने महान धर्म की गाथा गाने के लिए अब अवशेष हैं ,- वहाँ भारत में एक के बाद एक अनेकों धर्म पंथों का उद्भव हुआ और वे पंथ वेदप्रणीत धर्म को जड़ से हिलाते हुए प्रतीत हुए , पर भयंकर भूकंप के समय समुद्री किनारे की जलतरंगों के समान यह धर्म कुछ समय के लिए पीछे इसलिए हट गया कि वह तत्पश्चात हजार गुना अधिक बलशाली होकर सम्मुखस्त सबको डुबाने वाली बाढ़ के रूप में लौट आये और जब इन आगन्तुकों के विप्लवों का कोलाहल शांत हो गया , तब ये सभी धर्म संप्रदाय अपनी जन्म दात्री मूल हिन्दू धर्म की विराट काया द्वारा मानो शोषित होकर पचा लिए गए – उसी में समाविष्ट हो गए l 

हिन्दू जाति ने अपना धर्म आप्तवाक्य वेदों से प्राप्त किया है l उनकी धारणा है कि वेद अनादि और अनंत है l श्रोताओं को , संभव है , यह हास्यास्पद मालूम हो और वे सोचे कि कोई पुस्तक अनादि और अनंत कैसे हो सकती है , परन्तु वेद का अभिप्राय पुस्तकविशेष से नहीं है l वेद का अर्थ है भिन्न – भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक तत्वों का संचित कोष l जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत मनुष्यों के पता लगने के पूर्व से ही अपना काम करता चला आया था और आज यदि मनुष्य जाति उसे भूल भी जाये तो भी वह नियम अपना काम करता ही रहेगा , ठीक वही बात आध्यात्मिक जगत को चलाने वाले नियमों के सम्बन्ध में भी है l जो नैतिक तथा आध्यात्मिक पवित्र सम्बन्ध एक आत्मा का दूसरी आत्मा के साथ और प्रत्येक आत्मा का परम पिता परमात्मा के साथ हमारे पता लगाने के पूर्व थे , वे ही सम्बन्ध , हम चाहें उन्हें भूल भी जाये तो भी बने रहेंगे l 

इन सत्यसमूहों का आविष्कार करने वाले ऋषि कहलाते हैं और हम उनको पूर्णत्व को पहुंची हुई विभूति जानकर सम्मान देते हैं l श्रोतागणों को यह बतलाते हुए मुझे अत्यंत हर्ष होता है कि इनमें से कई तो अत्यंत उच्चपद प्राप्त स्त्रियाँ भी थीं l 

विभिन्नता में एकता – यही प्रकृति की रचना है और हिन्दुओं ने इसे भली-भांति पहचाना है l अन्य धर्मों में कुछ निर्दिष्ट मतवाद विधिबद्ध कर दिए गए हैं और सारे समाज को उन्हें मानना अनिवार्य कर दिया जाता है l वे तो समाज के सामने केवल एक ही नाप की कमीज रख देते हैं , जो राम , श्याम , हरि सबके शरीर में जबरदस्ती ठीक होनी चाहिए l और वह कमीज राम या श्याम के शरीर में ठीक नहीं बैठती , तो उसे नंगे बदन बिना कमीज के ही रहना होगा l हिन्दुओं ने यह जान लिया है कि निरपेक्ष ब्रह्म-तत्व की उपलब्धि , धारणा या प्रकाश केवल सापेक्ष के सहारे से ही हो सकता है l और मूर्तियाँ , क्रॉस या चाँद ये तो केवल आध्यात्मिक उन्नति के सहाय्यस्वरुप हैं l वे मानों बहुत सी खूंटियां हैं , जिनमें धार्मिक भावनाएं अटकाई जाती हैं l ऐसी बात नहीं है कि प्रत्येक के लिए इन साधनों की आवश्यकता हो , पर बहुतों के लिए तो यह आवश्यक हुआ ही करते हैं और जिनकों इन साधनों की सहायता की आवश्यकता नहीं रहती , उन्हें यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि इन साधनों का आश्रय लेना अनुचित है l 

भाइयों ! हिन्दुओं के धार्मिक विचारों का यही संक्षिप्त विवरण है l हो सकता है कि हिन्दू अपनी सम्पूर्ण योजना के अनुसार कार्य न कर सका हो , पर यदि कभी कोई सार्वभौमिक धर्म हो सकता है , तो वह ऐसा ही होगा जो देश या काल से मर्यादित न हो ; जिस अनन्त भगवान के विषय में वह धर्म उपदेश देता है , उसी के समान वह धर्म भी अनंत हो ; जिसकी ज्योति श्री कृष्ण के भक्तों पर और ईसा के प्रेमियों पर , संतों पर और पापियों पर भी समान रूप से प्रकाशित होती हो ; जो धर्म न तो ब्राह्मणों का हो , न बौद्धों का , न ईसाईयों का और न मुसलमानों का – वरन इन सभी धर्मों का समष्टि स्वरुप होते हुए भी जिसमें उन्नति का अनंत पथ खुला रहे ; जो अपनी विश्वव्यापकता के भीतर सृष्टि के प्रत्येक मनुष्य को अपने असंख्य बाहुओं द्वारा आलिंगन करते हुए उसके लिए स्थान रखे l वह विश्वधर्म ऐसा धर्म होगा कि उसमें अविश्वासियों पर अत्याचार करने या उनके प्रति असहिष्णुता प्रकट करने की नीति नहीं रहेगी , वह धर्म प्रत्येक स्त्री और पुरुष के ईश्वरीय भाव को स्वीकार करेगा ; जिसका सम्पूर्ण बल मनुष्य मात्र को अपनी सच्ची ईश्वरीय प्रकृति के साक्षात्कार करने के लिए सहायता देने में ही केन्द्रित रहेगा l 

प्रिय पाठकों, प्रस्तुत blog post स्वामी विवेकानंद द्वारा 1893 ईo में शिकागो धर्म परिषद् में दिए गए speech से संकलित है l जाहिर है , उनके काफी लम्बे speech के कुछ खास part को ही पेश किया गया है l हमारा उद्देश्य उनके महान thoughts को आपके समक्ष पेश करना है l फिर भी , अगर कोई त्रुटि हो गयी हो तो हम क्षमा प्रार्थी हैं l अपनी राय या comments निचे comment box में लिखें l धन्यवाद l       

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